पानी रे पानीनिबंध
किताबों वाला जल-चक्र
भूगोल की किताबों में हम जल-चक्र पढ़ते हैं और उसका एक सुंदर-सा चित्र भी देखते हैं — सूरज, समुद्र, बादल, हवा, धरती, बरसात की बूँदें और नदी।
समुद्र से उठी भाप बादल बनकर फिर पानी में बदलती है, बरसात होती है, और नदियाँ अपने चारों तरफ़ का पानी लेकर उसी समुद्र में जा मिलती हैं। इस तरह जल-चक्र पूरा हो जाता है।
लेकिन लेखक कहते हैं कि यह तो हुई किताबी बात। असली पानी का चक्कर हमारे घरों, स्कूल, कार्यालय, कारखानों और खेतों में कुछ और ही रूप में सामने आता है।
घर-घर का असली ‘पानी चक्र’
नलों में अब पूरे समय पानी नहीं आता। नल खोलो तो पानी की जगह सूँ-सूँ की आवाज़ आती है। पानी आता भी है तो बेवक्त — कभी देर रात को, कभी बहुत सबेरे।
लोग मीठी नींद छोड़कर घर भर की बाल्टियाँ, बर्तन और घड़े भरने दौड़ते हैं। पानी को लेकर आपस में तू-तू, मैं-मैं भी होने लगती है।
इन रोज़-रोज़ के झगड़ों से बचने के लिए कई घरों में लोग नल के पाइप में मोटर लगवा लेते हैं। इससे कई घरों का पानी खिंचकर एक ही घर में आ जाता है। यह अपने आस-पास का हक़ छीनने जैसा काम है। फिर मोहल्ले के और घर भी यही करने लगते हैं और पानी की कमी और बढ़ जाती है।
शहरों में तो अब कई चीज़ों की तरह पानी भी बिकने लगा है। यह कमी सिर्फ़ गाँव-कस्बों में नहीं, बल्कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बैंगलोर जैसे बड़े शहरों में भी लोगों को भारी कष्ट में डाल देती है। देश के कई हिस्सों में तो अकाल जैसी हालत बन जाती है।
बरसात में उलटा हाल
गर्मी की यह कहानी बरसात में पूरी तरह पलट जाती है। तब सब तरफ़ पानी ही पानी बहने लगता है — घरों, स्कूलों, सड़कों और रेल की पटरियों पर पानी भर जाता है।
देश के कई भाग बाढ़ में डूब जाते हैं, और यह बाढ़ न गाँवों को छोड़ती है, न मुंबई जैसे बड़े शहरों को। कुछ दिनों के लिए सब कुछ थम जाता है।
लेखक कहते हैं कि अकाल और बाढ़ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अगर हम इन दोनों को ठीक से समझ लें और सँभाल लें, तो कई समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है।
धरती की गुल्लक — निबंध का सबसे सुंदर उदाहरण
लेखक पानी की बात समझाने के लिए गुल्लक का उदाहरण देते हैं। जब भी हमें कोई पैसा देता है, हम उसे झट से अपनी गुल्लक में डाल देते हैं। एक रुपया, दो रुपया, कभी सिक्के तो कभी नोट — सब उसमें धीरे-धीरे जमा होते हैं। फिर जब ज़रूरत पड़ती है, हम उसी बचत का उपयोग करते हैं।
हमारी यह धरती भी एक बहुत बड़ी गुल्लक है — मिट्टी की बनी विशाल गुल्लक। प्रकृति वर्षा के मौसम में इसमें खूब पानी बरसाती है। रुपयों से भी कई गुना कीमती इस वर्षा को हमें इसी बड़ी गुल्लक में जमा कर लेना चाहिए।
गाँव और शहर के छोटे-बड़े तालाब और झील यही काम करते हैं — वे धरती की गुल्लक में पानी भरते हैं। इनमें जमा पानी ज़मीन के नीचे छिपे भूजल भंडार में धीरे-धीरे रिसकर पहुँचता है और उसे समृद्ध बनाता है। यह खज़ाना दिखता नहीं, पर बरसात बीत जाने के बाद पूरे साल भर हम इसी में से घर, खेत और पाठशाला के लिए पानी निकालते हैं।
हमने कौन-सी बड़ी गलती की?
एक दौर ऐसा आया जब हम इस छिपे खज़ाने का महत्व भूल गए। ज़मीन के लालच में हमने अपने तालाबों को कचरे से पाटकर समतल बना दिया। देखते-ही-देखते उन पर कहीं मकान, कहीं बाज़ार, स्टेडियम और सिनेमा खड़े हो गए।
इस बड़ी गलती की सज़ा अब हम सबको मिल रही है — गर्मी में नल सूख जाते हैं और बरसात में बस्तियाँ डूबने लगती हैं।
इसलिए अगर अकाल और बाढ़ से बचना है तो अपने आस-पास के जलस्रोतों, तालाबों और नदियों की रखवाली अच्छे ढंग से करनी पड़ेगी।
जल-चक्र को ठीक से समझें, बरसात हो तो उसे थाम लें, अपना भूजल भंडार सुरक्षित रखें और अपनी गुल्लक भरते रहें — तभी ज़रूरत के समय पानी की कोई कमी नहीं आएगी।
निबंध की खास बातें
- कठिन विषय को गुल्लक जैसे रोज़मर्रा के उदाहरण से समझाया गया है।
- लेखक भाषण नहीं देते — वे सवाल पूछते हैं और पाठक को खुद सोचने देते हैं।
- समस्या के साथ-साथ समाधान भी बताया गया है।
- तालाब सिर्फ़ पानी जमा नहीं करते, वे भूजल भंडार को भरते हैं।
लेखक से परिचय
अनुपम मिश्र (1948–2016) एक प्रखर लेखक, संपादक और जाने-माने पर्यावरणविद होने के साथ-साथ छायाकार भी थे। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उन्होंने अनेक प्रयोगात्मक कार्य किए।
आज भी खरे हैं तालाब उनकी सर्वाधिक चर्चित पुस्तक है, जिसका अनुवाद ब्रेल लिपि सहित अनेक भाषाओं में हो चुका है। साफ़ माथे का समाज उनकी एक और महत्वपूर्ण पुस्तक है।
वे गांधी शांति प्रतिष्ठान से प्रकाशित होने वाली पत्रिका गांधी मार्ग के संस्थापक और संपादक भी थे।
पढ़ने के लिए — विश्वेश्वरैया
आकाश में अँधेरा छाया था, बादल टकराते तो बिजली चमकती और गर्जन होता। फिर मूसलाधार वर्षा होने लगी और थोड़ी ही देर में गड्ढे तथा नालियाँ पानी से भर गईं।
छह वर्ष के विश्वेश्वरैया अपने घर के बरामदे में खड़े यह दृश्य निहार रहे थे। पास की नाली का पानी उमड़-घुमड़कर जलप्रपात का रूप ले चुका था और एक बहुत बड़े पत्थर को भी अपने साथ बहा ले जा रहा था। उन्होंने हवा और सूर्य की शक्ति को भी देखा और मन ही मन कहा कि प्रकृति शक्ति है और उन्हें प्रकृति के बारे में सब कुछ जानना चाहिए।
फिर उन्होंने थोड़ी दूर पर उसी मूसलाधार वर्षा में ताड़पत्र की छतरी लिए खड़ी एक स्त्री को देखा। उसके कपड़े फटे हुए थे, वह कमज़ोर और भूखी लग रही थी और झोंपड़ी में रहती थी। उसके बच्चे कभी स्कूल नहीं जाते थे। यह देखकर बालक विश्वेश्वरैया सोचने लगे कि वह इतनी गरीब क्यों है?
उन्होंने बड़ी गंभीरता से प्रकृति और गरीबी दोनों के कारण जानने का प्रयास किया। वे अपने अध्यापकों से भी जिरह करते और पूछते कि ऊर्जा के प्रचलित स्रोत कौन-से हैं और उसे पकड़कर कैसे इस्तेमाल में लाया जा सकता है। सवाल पूछने की यही आदत उन्हें आगे चलकर महान बनाती है।
शब्दार्थ
| जल-चक्र | पानी का बार-बार चलने वाला चक्र |
| भूजल भंडार | ज़मीन के नीचे जमा पानी |
| अकाल | सूखा, अन्न-जल की भारी कमी |
| गुल्लक | पैसे जमा करने का बर्तन |
| पाटना | भरकर बराबर कर देना |
| रिसना | धीरे-धीरे टपकना या भीतर जाना |
| जलस्रोत | पानी का स्रोत |
| बेवक्त | गलत समय पर |
| मूसलाधार | बहुत तेज़ (वर्षा) |
| जलप्रपात | झरना |
| निहारना | ध्यान से देखना |
| जिरह करना | बहस करना, कुरेदकर पूछना |